25 सितम्बर गुरूवार 2014 सम्वत
2071 को
शारदीय नवरात्र प्रारम्भ होंगे,इस दिन शुक्र
कन्या राशि में
प्रवेश कर सूर्य
तथा राहु के
साथ युति बनायेंगे,नवरात्र के
नौ दिन में
हिन्दू धर्मावलम्बी देवी
दुर्गा -भगवती के
नौ स्वरूपों की
पूजा आराधना करते
है,वाही दूसरी
और योगी ध्यान
साधना करते है
तो तांत्रिक लोग
तंत्र साधना और
यन्त्र सिद्धि करते
है,माँ की
पूजा में लाल
वस्त्र पहने जाते
है,तथा बंगलामुखी की
पूजा में पीले
रंग के वस्त्र
पहने जाते है
तथा पीले पुष्प
ही चढ़ाने का
विधान है,पूजा
में साधक को
ऊनि कम्बल या
कुशा के आसन
पर पूर्व या
उत्तर दिशा की
तरफ मुँह करके
बैठना चाहिये,निम्न
मन्त्र से आचमन
करे
ॐ केशवाय नमः ॐ माधवाय नमः
ओम नारायणाय नमः।
आचमन के बाद निम्न मन्त्र पढ़कर हाथ ढोले
' ओम हृषीकेशाय नमः।
नवरात्रा में माँ दुर्गा की आराधना और
पूजा में मंगलघट
यानि कलश की
स्थापना की जाती है,इसमें शुद्ध जल भरा
जाता है,कलश
स्थापना करते समय इस
मन्त्र को पढ़े
-
ओम स्था स्थी स्थिरो
भव। ॐ भूर्भव स्वः भौ वरुण।
यहघच्छ
इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि।
इस मन्त्र के
साथ कलश को
स्थापना करे। अब आप
इस कलश पर
स्वस्तिक बनाये। स्वस्तिक बनाकर
कलश पर मोली
बन्ध दे,निम्न
मन्त्र पढ़ते हुए
रोली मोली पुष्प
चावल चढ़ावे।
कलशये मुखे विष्णु कण्ठे रूद्र समाश्रित।
मुले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा स्मृता।
ऋग्वेदोत्थ यजुर्वेद सामवेदो हथवार्ण।
करतेन अनने पूजनेन
कलशे
वरुणाधावहित
देवताः प्रियन्ता न मम।
इस मन्त्र से
कलश पर जल
छिड़के। गंध ,अक्षत
,पुष्प चढादे,तथा
कलश तथा जल
के देवता वरुण
को नमस्कार,कलश
स्थापना का अपना एक
अलग ही महत्त्व है,शास्त्रो में ,वैदिक साहित्य के
विराट काल पुरुष
के लघु प्रतिक
के रूप में
कलश स्थापना किये
जाने का विस्तृत वर्णन
है,इसीलिए सभी
मांगलिक कार्यो में कलश
स्थापना करना अत्यंत शुभ
माना गया है,कलश स्थापना से
सारे कार्ये निर्विघ्न पूर्ण
हो जाते है,मंगलघट में काम
आने वाला कलश
ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना
गया है,और
जल तो है
ही जीवन दायक,नारियल का महहतव
भी आप समय
समय पर समझ
आता है,घाट
स्थापना में आम की
पत्तिया का में ली
जाती है जो
की उन्नति और
समृद्धि कारक है,आम
के वृक्ष को
सदाबहार वृक्ष मन गया
है,इसलिए इसकी
पतिया भी शुभ
मणि गयी है,लाल वस्त्र मंगल
का प्रतिक माना
गया है,शुभ
कार्य में कलश
की स्थापना ब्रह्मा ,विष्णु,महेश इन तीन
देवो के रूप
में भी की
जाती है,इसलिये
कलश स्थापना को
पूजा या वैदिक
अनुष्ठानो में सबसे महत्वपूर्ण कार्य
मन जाता है,इसके बाद श्री
गणेशजी के प्रतिक
एक साबुत सुपारी
पर मोली लपेटकर
चौंकी पर चावल
रखकर उस पर
गणेश जी स्वरूप
सुपारी को स्थापित करे,इस बीच पवित्रीकरण तथा
स्वातिवचन करले,इसके बाब
गणेश जी के
दाहिनी और माता
की फोटो या
मूर्ति स्थापित करे,ये ध्यान जरूर
रखे की शुद्ध
मिट्टी की वेदी
बनाकर उसमे जौ
बोने के बाद ही
माता की मूर्ति
के पास चौकी
पर कलश स्थापित करे,ये कलश ही
मंगल घट का
आधार माना जाता
है,
घट स्थापना के
बाद पूजा से
पूर्व शुद्ध देशी
घी [अगर गाय
का हो तो
अति उतम ] का
अखण्ड दीपक जलाये,दीपक जलाते समय
इस मन्त्र का
प्रयोग करे --
अखण्ड दीपकदेव्या प्रियते नवरात्रकम्।
उज्ज्वलये अहोरात्रमेक चितोघर्ट व्रत।
देवी की पूजा
के प्रारम्भ में
उनका ध्यान ,स्मरण,आह्वान करे। तथा
आसन समर्पित करे,पूजा के समय
कोई अन्य धवनि
या आवाज़ से
विघ्र नही होना
चाहिये,घर का
पूरा वातावरण शांत,स्थिर मंगलमय होना
चाहिये।अगर पूजन के समय
सभी मन्त्र याद ना
हो तो
' ॐ श्री मन्महादुर्गाय नमः ' इस
मन्त्र से माँ
दुर्गा का षोडशोपचार पूजन
करे जैसे -
' ॐ श्री मन्महादुर्गाय
नमःआसन निवेदयामि।
' ॐ श्री मन्महादुर्गाय
नमःपद्ध समर्पयामि।
' ॐ श्री मन्महादुर्गाय
नमःअधर्य समर्पयामि।
इसी प्रकार से
आचमन ,वस्त्र,गंध,आभुसन,पुष्प,धुप,अक्षत,दीपक,नैवेद्य,श्रीफल,ताम्बूल,दक्षिणा समर्पित करे,इसके पश्चात
कपूर आरती करे,पुष्पांजलि अर्पित करे,तथा
दंडवत प्रणाम करे
अंत में क्षमा
प्रार्थना करे
ॐ जयंती मंगला काली भद्र काली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोअस्तुते।
[ कब करे घट
स्थापना ]
25 सितम्बर 2014 आश्विन शुक्ल
पक्ष संवत 2071 शक
1936 बृहस्पतिवार के
दिन प्रतिपदा तिथि
दोपहर 01 बजकर 22 मिनिट
तक रहेगी,अतः
घट स्थापना दोपहर
तक ही मान्य
रहेगी।
प्रातः 06 .31से 8 बजे तक
शुभ का चौघड़िया,दोपहर
12. 05 से
12 29 तक
अभिजीत मुहूर्त
तथा दोपहर 12.31 से 01. 22 तक लाभ का चौघड़िया रहेगा। इसमें आप अपने सुविधानुसार घट स्थापना कर सकते है,
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